Wednesday, December 4, 2013

नदी

वो नदी सी मुझ पत्थर के ऐब मिटा गयी,
जो मैंने माँगा उसका साथ , मुझे छोड़ वो सागर में समा गयी | 

आज मैं रत्नो में श्रेष्ठ हु ,
मुकुटों में जड़ने योग हु
सब मेरे गुण को सराहते है ,
पर मुझे ऐसा बनाने वाली नदी को नहीं पहचानते है | 

आज भी उस नदी कि याद आती है ,
समा  जाऊ  उसमे ये इच्छा जगती है |

पर जो बिछड़े, फिर कहा वो मिल पाते है
पत्थर के  रूह  पर ना दिखने वाले लहरो के बस  निशान रह जाते है .. बस  निशान रह जाते है |

No comments:

Post a Comment