जब खुले थे तो खुद ही जा उलझा था उसकी जुल्फों में
आज खुद ही उससे निकलने को कहता है मन
जाने किन भावों में बहता है मन
अजीब कश्मकश में रहता है मन
जब पास थी तो उससे दूर जाने का करता था मन
आज दूर है तो उसके लिए तड़पता है मन
होश में होकर भी मदहोश रहता है मन
अजीब कश्मकश में रहता है मन (SJ)