वो नदी सी मुझ पत्थर के ऐब मिटा गयी,
जो मैंने माँगा उसका साथ , मुझे छोड़ वो सागर में समा गयी |
आज मैं रत्नो में श्रेष्ठ हु ,
मुकुटों में जड़ने योग हु
सब मेरे गुण को सराहते है ,
पर मुझे ऐसा बनाने वाली नदी को नहीं पहचानते है |
आज भी उस नदी कि याद आती है ,
समा जाऊ उसमे ये इच्छा जगती है |
पर जो बिछड़े, फिर कहा वो मिल पाते है
पत्थर के रूह पर ना दिखने वाले लहरो के बस निशान रह जाते है .. बस निशान रह जाते है |